Chhattisgarh Me Maratha Shasan | छत्तीसगढ़ में मराठा काल और मराठा शासन का स्वरूप की पूरी जानकारी Hindi में

छत्तीसगढ़ में मराठा - हेल्लो दोस्तों, आज की इस लेख में हम आपको छत्तीसगढ़ में मराठा काल और मराठा शासन का स्वरूप के बारे में  जानकारी देंगे, जोकि छत्तीसगढ़ में आयोजित होने वाली सभी Exams के लिए बहुत ही उपयोगी और महत्वपूर्ण साबित होगी | तो दोस्तों हमारे लेख को अंत तक जरुर पढ़े ताकि आपको पूरी जानकारी मिल सके |

Chhattisgarh Me Maratha Shasan

छत्तीसगढ़ में मराठा काल -

  • नागपुर के भोंसले वंश के शासक रघुजी प्रथम के दक्षिण भारत अभियान के दौरान उनके सेनापति भास्कर पंत ने दक्षिण कोसल पर कब्जा जमाने का प्रयास प्रारंभ किया. 1741-42 में रतनपुर के क्षेत्र में उसने अपना प्रभुत्व स्थापित किया. इस समय रतनपुर में रघुनाथ सिंह का शासन था.
  • रतनपुर में प्रारंभ में मराठा प्रतिनिधि के रूप में कल्चुरी शासक रघुनाथ सिंह को शासन करने दिया गया किन्तु 1745 में रघुनाथ सिंह के बाद मोहनसिंह को शासक नियुक्त किया गया. 
  • मोहन सिंह की मृत्यु उपरांत 1758 में रघुजी भोंसले के पुत्र बिम्बाजी भोंसले ने अपना प्रत्यक्ष शासन रतनपुर में स्थापित किया. 1750 में रायपुर की कल्चुरी शाखा के शासक अमरसिंह को अपदस्थ कर 1757 तक समूचे क्षेत्र में बिम्बाजी भोंसले ने अपना शासन स्थापित कर लिया. 
  • बिम्बाजी (1758-87 ई.) को छत्तीसगढ़ का प्रथम स्वतंत्र मराठा शासक माना जाता है. इनकी एक स्वतंत्र सेना थी. इसने स्थायी न्यायालय की स्थापना की तथा रतनपुर में रामटेकरी मंदिर का निर्माण कराया. उसका शासन जनहितकारी था.
  • बिम्बाजी के काल का विवरण यूरोपीय यात्री कोलबुक ने भी दिया है. बिम्बाजी के पश्चात् चिमणजी कुछ समय के लिए छत्तीसगढ़ के शासक बने. 
  • व्यंकोजी भोंसला (1787-1815 ई.)- इसके बाद व्यंकोजी को छत्तीसगढ़ का राज्य प्राप्त हुआ. व्यंकोजी यहाँ का शासन सूबेदारों के माध्यम से चलाने लगे जिससे छत्तीसगढ़ में सूबेदारी पद्धति अथवा सूबा शासन का सूत्रपात हुआ. यह व्यवस्था 1818 तक जारी रही.

मराठा काल के प्रमुख सुबेदार -

  • महिपत राव दिनकर (1787-90 ई.)- छत्तीसगढ़ का पहला सूबेदार नियुक्त गया. 1790 में फारेस्टर ने छत्तीसगढ़ की यात्रा की. 
  • विट्ठलराव दिनकर (1790-96 ई.) ने परगना पद्धति की शुरूआत की, छत्तीसगढ़ को 28 परगनों में वर्गीकृत किया. 1795 में जे.टी. ब्लंट ने छत्तीसगढ़ की यात्रा की |
  • केशव गोविंद (1797-1808 ई.)-छत्तीसगढ़ में सबसे लंबा कार्यकाल वाला सूबेदार रहा, इसके काल में कोलब्रूक ने छत्तीसगढ़ की यात्रा की थी. 
  • इनके अलावा भवानी कालू, बीकाजी गोपाल, सखाराम, सीताराम आदि सुबेदार हए. यादवराव दिवाकर छत्तीसगढ़ में नियुक्त होने वाला अंतिम सुबेदार था

ब्रिटिश नियंत्रण काल (1818 से 1830) -

  • तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध के दौरान 1817 में सीताबर्डी के युद्ध में मराठे पराजित हुए और 1818 की नागपुर की संधि से अंग्रेजों का अप्रत्यक्ष नियंत्रण छत्तीसगढ़ क्षेत्र में स्थापित हुआ. छत्तीसगढ़ पहली बार ब्रिटिश शासन के अधीन.
  • अंग्रेजों ने छत्तीसगढ़ क्षेत्र की राजधानी रतनपुर से स्थानांतरित कर रायपुर को बनाया. इस काल में अंग्रेजों ने अपने रेजीडेण्ट एवं अधीक्षकों के जरिए शासन संचालित किया. ब्रिटिश रेजीडेण्ट जेनकिंस ने सूबा पद्धति को समाप्त किया।

छत्तीसगढ़ में नियुक्त ब्रिटिश अधीक्षक -

  • कैप्टन एडमन्ड (1818) छत्तीसगढ़ का पहला अंग्रेज अधीक्षक था. इसके काल में डोंगरगढ़ के जमींदार ने विद्रोह किया, इसमें खैरागढ़ के जमींदार ने अंग्रेजों का साथ दिया. 
  • कर्नल एग्न्यू (1818-25) कर्नल एग्न्यू के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ का मुख्याल रतनपुर से हटाकर रायपुर लाया गया. इसने परगनों का पुनर्गठन किया. अमा पंड्या नामक नये कर्मचारी नियुक्त किये, किसानों को किस्त में कर जमा करने की व्यवस्था की. इसके काल में सोनाखान (1819), परलकोट (1824-25) में विद्रोह हुआ, गोंड़ शासकों ने भी इसके काल में विद्रोह (1818-25) किया. 
  • कैप्टन सैण्डिस (1825-28) इसने कामकाज के लिए अंग्रेजी भाषा तथा अंग्रेजी कलेंडर का प्रयोग किया. छत्तीसगढ़ में डाक-तार सेवा की शुरूआत की लोरमी और तरेंगा नवीन ताहुतदारी प्रारंभ. 
  • कैप्टन क्रॉफर्ड (1829-30) छत्तीसगढ़ में नियुक्त अंतिम ब्रिटिश अधीक्षक था जिसने ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में रघुजी तृतीय को सत्ता सौंपी. 
  • प्रमुख अधीक्षक- कैप्टन एडमंड, कैप्टन एग्न्यू, कैप्टन हंटर, कैप्टन सैण्डिस, कैप्टन विल्किन्सन, कैप्टन क्रॉफर्ड |

रघुजी भोंसले तृतीय का काल (1830-1853 ई.) -

  • भोसले वंश के रघुजी तृतीय के वयस्क होने पर 1830 में अंग्रेजों ने छत्तीसगढ़ का शासन उसे सौंप दिया. जिसने 1853 तक शासन किया, 1853 में उसकी मृत्यु हुई. 
  • रघुजी भोंसले तृतीय ने सूबेदार के स्थान पर छत्तीसगढ़ में जिल्हेदारों के माध्यम से शासन किया. प्रथम जिल्हेदार कृष्णाराव अप्पा एवं अंतिम जिल्हेदार गोपाल राव थे। 
  • रघुजी भोंसले तृतीय के समय हुए विद्रोह- धमधा के गोंड़ जमींदार द्वारा विद्रोह, तारापुर विद्रोह, माड़िया विद्रोह तथा बरगढ़ के जमींदार का विद्रोह |
  • रघुजी तृतीय द्वारा 1831 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया। 
  • गवर्नर जनरल डलहौजी ने व्यपगत नीति के अंतर्गत 1854 में नागपुर का ब्रिटिश राज्य में विलय.
  • नागपुर के विलय के साथ ही समस्त छत्तीसगढ़ ब्रिटिश शासन के प्रत्यक्ष प्रशासन के अधीन आ गया. 
  • प्रमुख शासक- बिम्बाजी भोंसले, चिमणजी, व्यंकोजी भोंसले, रघुजी तृतीय. 
  • छत्तीसगढ़ में सुबेदारों का क्रम : महिपतराव दिनकर, विट्ठलराव दिनकर, भवानी कालू, केशव गोविन्द, बीकाजी गोपाल, सखाराम हरि, सीताराम टांटिया, यादवराव दिवाकर.

ब्रिटिश शासन के अधीन छत्तीसगढ़ -

  • अंग्रेजों ने मध्य क्षेत्रों के शासन संचालन को व्यवस्थित करने हेतु 2 नवम्बर 1861 को सेन्ट्रल प्राविन्स (मध्यप्रांत) का निर्माण किया जिसमें नागपुर क्षेत्र के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के रायपुर, बस्तर क्षेत्र भी सम्मिलित थे. 
  • इसके अंतर्गत 1862 में छत्तीसगढ़ को एक संभाग का दर्जा दिया गया. जिसके अंतर्गत रायपुर, बिलासपुर, संबलपुर तीन जिले बनाए गए थे. 
  • 1905 में बंगाल प्रांत एवं सेन्ट्रल प्राविन्स का पुनर्गठन किया गया जिससे सेन्ट्रल प्राविन्स की सीमाओं में परिवर्तन हुआ. बंगाल प्रांत से सरगुजा, उदयपुर, जशपुर, कोरिया, चांगभखार रियासतों का प्रशासन मध्यप्रांत को सौंपा गया. छत्तीसगढ़ संभाग के संबलपुर जिले के बामड़ा, रेडाखोल, पटना, सोनपुर एवं कालाहाण्डी क्षेत्र बंगाल प्रांत में मिला दिया गया.

छत्तीसगढ़ में मराठा शासन का स्वरूप -

  • प्रशासनिक व्यवस्था- भोसला बिम्बाजी के काल में शासन व्यवस्था हैहयकालीन शासन व्यवस्था के अनुरूप ही चलती रही। राजकुमार व्यंकोजी ने यहाँ का शासन प्रतिनिधि शासक सूबेदारों के माध्यम से चलाना आरंभ किया, जिसे सूबा शासन की संज्ञा दी गयी। प्रथम सूबेदार महिपत राव थे. 
  • द्वितीय मराठा सूबेदार विट्ठल दिनकर ने राजस्व व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए गढ़ों के स्थान पर समूचे छत्तीसगढ़ को परगनों में विभाजित किया. मराठों द्वारा गठित परगनों की संख्या 27 थी। 
  • सम्पूर्ण प्रशासन को दो भागों में विभाजित किया गया, प्रथम प्रत्यक्ष शासन वाले खालसा क्षेत्र, द्वितीय जमींदारी क्षेत्र कहा जाता था. 
  • मराठों द्वारा निर्धारित राशि जो जमींदारी टैक्स अथवा टकोली के नाम से जाना जाता था। 
  • भोंसला शासन के प्रमुख अधिकारी- हैहयकालीन व्यवस्था में कोई बड़ा मौलिक परिवर्तन नहीं किया गया, फिर भी अनेक नवीन पदों का सृजन किया गया। 
  • सूबेदार- सूबेदार यहाँ सैनिक, असैनिक, दीवानी, फौजदारी तथा माल विभाग का प्रमुख अधिकारी होता था, जो व्यक्ति छत्तीसगढ़ सूबा पर निर्धारित राशि को पटाने का आश्वासन देता था, उसी की नियुक्ति सूबेदार के पद पर की जाती थी। 
  • जिल्हेदार- सूबेदार के स्थान पर 1830 से नियुक्त पदाधिकारी। 
  • फड़नवीस- फड़नवीस का कार्य आय और व्यय का हिसाब रखना था.
  • पोतदार- यह खजाने का हिसाब-किताब रखता था। 
  • कमाविसदार- परगने का प्रमुख अधिकारी, सैनिक, असैनिक, दीवानी, फौजदारी, माल संबंधी सभी अधिकार प्राप्त, यह पद 1818 तक बनी रही. 
  • बड़कर- बड़कर को कमाविसदार के पास परगने की सामान्य स्थिति, फसल की दशा एवं अन्य मामलों की सूचना भेजनी पड़ती थी।
  • बरारपाण्डे- यह गाँव का लगान विवरण एकत्र कर कमाविसदार को भेजता था |
  • माल चपरासी- अपराधियों की खोज खबर एवं कर वसूली. 
  • ग्राम स्तर के अधिकारी- पटेल, चौहान- ग्राम रक्षक 
  • गौटिया- कल्चुरी काल से पदाधिकारी, लगान वसूली, सामान्य निगरानी 
  • पटेल- मराठा काल में सृजित पद, राजस्व वसूली में गौटिया की सहायता 
  • कोटवार- ये गाँव में पहरा देते थे. गाँव में उन्हें एक खेत, अनाज पारिश्रमिक के रूप में मिलता था. 
  • राजस्व व्यवस्था- राजस्व व्यवस्था अधिकाधिक लाभ की नीति पर कार्य करता था|
  • तालुकदारी- किसी क्षेत्र विशेष के भूमि संबंधी पट्टे एक निश्चित अवधि के लिा तालुकदार को ठेके पर, तरेंगा एवं लोरमी में लागू. ताहुतदारी व्यवस्था में पट्टे पर आधारित राजस्व वसूली का अधिकार दिया जाता था. मराठा काल में सिहावा, खल्लारी और सन्जारी 3 नई ताहुतदारी स्थापित की गई थी। (तरेंगा, लोरमी सेंडिस के काल में निर्मित ताहुतदारी) 

मराठा कालीन कर -
  • टकोली- जमींदारों द्वारा मराठा शासकों को दिया जाने वाला वार्षिक कर 
  • सायर- वस्तुओं के आयात निर्यात पर लिया जाने वाला कर 
  • कलाली- आबकारी कर, मादक पदार्थों पर कर 
  • पंडरी- गैर कृषकों जैसे बढ़ई, कुम्हार, नाई आदि से लिया जाने वाला कर
  • सेवई- अनेक छोटे करों का सामूहिक नाम, अर्थदण्ड 
  • पंचायत व्यवस्था- गोंटिया आपसी विवादों का निराकरण करने के लिए पंचायतों का आयोजन करवाता था.
  • पुलिस व्यवस्था- कोतवाल गाँवों में पहरा देते थे. चपरासी अपराधियों की खाज किया करते थे. कमाविसदार अपराधों पर अपना निर्णय देता था. 
  • विनिमय एवं माप- मराठा काल में धातु के सिक्कों का प्रचलन समित साधारणतः विनिमय कौड़ियों के माध्यम से होता था, सिक्कों में नागपुरी रु चलन था, जिसमें रघजी का रूपया. चाँदी रूपया तथा जबलपूरी रुपया ब्रिटिश काल में इनमें एकरूपता लायी गयी।

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