Chhattisgarh Me kalchuri Vansh | छत्तीसगढ़ में कल्चुरी वंश की पूरी जानकारी Hindi में

छत्तीसगढ़ में कल्चुरी वंश - हेल्लो दोस्तों, आज की इस लेख में हम आपको छत्तीसगढ़ में कल्चुरी वंश के बारे में  जानकारी देंगे, जोकि छत्तीसगढ़ में आयोजित होने वाली सभी Exams के लिए बहुत ही उपयोगी और महत्वपूर्ण साबित होगी | तो दोस्तों हमारे लेख को अंत तक जरुर पढ़े ताकि आपको पूरी जानकारी मिल सके |

Chhattisgarh Me kalchuri Vansh | छत्तीसगढ़ में कल्चुरी वंश की पूरी जानकारी Hindi में

छत्तीसगढ़ में कल्चुरी वंश -

लगभग 6वीं शताब्दी के आस-पास मध्य भारत में कल्चुरियों का अभ्युदय हुआ. कल्चुरियों ने आरंभ में महिष्मति (महेश्वर जि. खरगौन, म.प्र.) को सत्ता का केन्द्र बनाया एवं कालान्तर में कल्चरियों की शाखा जबलपुर के समीप त्रिपुरी नाम क्षेत्र में कोकल्ल द्वारा स्थापित की गई. छत्तीसगढ़ में कल्चुरियों का प्रादुर्भाव 9वी सदी में हुआ - प्रारंभ में इनका केंद्र रतनपुर था बाद में रायपुर एक नवीन केंद्र के रूप में विकसित हु मराठों के आगमन के पर्व तक लगभग सम्पर्ण छत्तीसगढ़ में कल्चुरियों का प्रभुत्व बना रहा |

रतनपुर के कल्चुरी वंश -

  • 9वीं सदी के उत्तरार्द्ध में कोकल्ल के पुत्र शंकरगण ने बाण वंशीय शासक विक्रमादित्य प्रथम को परास्त कर पाली क्षेत्र (जिला- कोरबा) पर कब्जा किया और छत्तीसगढ़ में कल्चरी वंश की नींव रखी. यह विजय अस्थायी रही |
  • कलिंगराज (लगभग 1000-1020 ई.)- छत्तीसगढ़ में कल्चुरी वंश का वास्तविक संस्थापक था इसने तुम्माण को आरंभिक राजधानी बनायी. कमलराज (1020-45 ई.) के शासन काल में लगभग 11वीं सदी तक सम्पर्ण दक्षिण कोसल क्षेत्र में कल्चुरियों का प्रभुत्व स्थापित हो गया |
  • कमलराज का उत्तराधिकारी रत्नदेव प्रथम (1045-65 ई.) हआ। इसने 1050 ई के लगभग रत्नपुर जिसे कुबेरपुर की उपमा दी गई, नामक नगर बसाकर राजधानी तुम्माण से यहाँ स्थानांतरित की। महामाया मंदिर का निर्माण इन्हीं के द्वारा कराया गया |
  • पृथ्वीदेव प्रथम (1065-95 ई.)- ने सकलकोसलाधिपति की उपाधि धारण की |
  • जाज्व ल्यादेव प्रथम (1095-1120 ई.) ने ओडिशा क्षेत्र के शासक को परास्त किया एवं स्वयं को त्रिपुरी की अधीनता से स्वतंत्र घोषित किया. जाज्वल्य देव जाज्वल्यपुर (आधुनिक जाँजगीर) नगर की स्थापना की गई. इसने अपने नाम पर स्वर्ण मद्राएँ प्रचलित करायी जिस पर श्रीमज्ज जाज्वलयदेव तथा गजशार्दल पाली के शिव मंदिर का जीर्णोद्वार कराया जो आज भी सुरक्षित है |
  • रलदेव द्वितीय (1120-1135 ई.)- त्रिपुरी के शासक गयाकर्ण तथा गंगवंशी या अनंतवर्मन चोडगंग ने आक्रमण किया परन्तु पराजित हुए।
  • पृथ्वीदेव द्वितीय (1135-65 ई.)- ने चक्रकोट पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया इससे अनंतवर्मन चोडगंग भयभीत होकर समुद्र तट की ओर भाग गया। इसके सेनापति जगपाल द्वारा राजिम के राजीव लोचन मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। 
  • रत्नदेव तृतीय (1178-98 ई.)- ने एक ब्राह्मण गंगाधर को प्रधानमंत्री बनाया। गंगाधर ने खरौद के लक्ष्मणेश्वर मंदिर के सभी मंडपों का जीर्णोद्धार कराया। 
  • बाहरेन्द्र अथवा बाहरसाय (1480-1525 ई.)- के काल में राजधानी रतनपुर से कोसंगा (वर्तमान छुरी) स्थानांतरित कर दी गई थी |
  • कल्याणसाय- इसके समय की एक राजस्व पुस्तिका का उल्लेख मिलता है, जिसका अध्ययन बंदोबस्त अधिकारी मि. चिशम द्वारा किया गया. जिसमें उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था, राजस्व सैन्य एवं बल की जानकारी मिलती है। कल्याण साय मुगल सम्राट जहांगीर के दरबार में लगभग आठ वर्ष रहा (तुजुक-ए-जहांगीरी)। कल्याणसाय की जमाबंदी अकबर के पूर्व की विकसित राजस्व व्यवस्था थी. 
  • तखतसिंह ने तखतपुर की स्थापना 17वीं शताब्दी के अंत में की थी. 
  • कल्चुरी वंश का अंतिम शासक रघुनाथ सिंह था जिस पर मराठा सरदार भास्कर पत ने आक्रमण किया, रघुनाथ सिंह द्वारा आत्मसमर्पण, 1741 ई. में मराठा प्रभुत्व स्था किया.
  • मराठों के अधीन रतनपुर का अंतिम कल्चुरी शासक मोहन सिंह था। 
  • प्रमुख शासक- कलिंगराज, कमलराज, रत्नदेव प्रथम, पृथ्वीदेव प्रथम, प्रथम, रत्नदेव द्वितीय, पृथ्वीदेव द्वितीय, जाज्वल्यदेव द्वितीय, जगदेव, रत प्रतापमल्ल, बाहरेन्द्र साय, कल्याण साय, तखत सिंह, राजसिंह, रघुनाथ सिंह, मोहन सिंह |

रायपुर के कल्चुरी वंश -

  • 14वी सदी में रतनपुर के कल्चुरी वंश की एक शाखा रायपुर में स्थापित हुई. रायपुर शाखा का संस्थापक संभवतः केशवदेव नामक राजा था।
  • कलचुरी वंश के राजा रामचंद्र ने रायपुर शहर की स्थापना की. उनके पुत्र ब्रह्मदेव राय के नाम पर इसका नामकरण हुआ. 
  • इस वंश के शासक ब्रह्मदेव के काल का खल्लारी शिलालेख इस वंश की जानकारी का स्रोत है. खल्वाटिका (खल्लारी) इनकी प्रारंभिक राजधानी थी. बाद में कल्चुरी रायपुर में स्थापित हुए. खल्लारी शिलालेख में देवपाल नामक एक मोची द्वारा नारायण मंदिर निर्माण की जानकारी भी मिलती है. 
  • इस वंश के प्रमुख शासकों में रामचन्द्र देव, ब्रह्मदेव राय, सूरतसिंह देव, चामुंडसिंह देव, उमेदसिंह देव, बनवारीसिंह देव आदि शामिल थे |
  • इस वश का अंतिम शासक अमरसिंह हुआ जिसके बाद 1750 ई. तक इस क्षेत्र में मराठा का प्रभुत्व स्थापित हो गया. मोहन सिंह की मृत्यु के बाद 1757 ई. तक संपूर्ण कल्चुरी राज्य को मराठों ने अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण में ले लिया.
  • कलचुरी शासन के अन्तर्गत दक्षिण कोसल में वैभवयक्त नगरों के रूप में रतनपुर, मल्लार, जाजल्यनगर, विकर्णपर आदि का उल्लेख मिलता है.
  • कलचुरी काल मध्यकालीन छत्तीसगढ के इतिहास में महत्वपूर्ण अध्याय था. इस काल में प्राचीन आय एवं अनार्य दोनों की शासन व्यवस्था के अवशेष इस प्रांत में बने रहे.
  • कलचुरी मुख्यतः शैव मतावलंबी थे. इनकी कलदेवी गजलक्ष्मी थी, कल्चरी कालीन मदिरों में गजलक्ष्मी एवं शिव की मूर्तियां प्राप्त होता |
  • प्रमुख शासक- केशव देव, रामचन्द्र देव, ब्रह्मदेव राय व, उमेदसिंह देव, बनवारी सिंह देव, अमर सिंह |

कल्चुरी शासन प्रबंध -
  • प्रशासनिक व्यवस्था- राज्य अनेक प्रशासनिक इकाइयों राष्ट्र (संभाग), विषय (जिला), देश या जनपद (वर्तमान तहसीलों की तरह) व मण्डल (वर्तमान खण्ड की तरह) विभक्त था. 
  • मण्डलाधिकारी मांडलिक तथा उससे बडा महामण्डलेश्वर (एक लाख ग्रामा का स्वामी) कहलाता था। 
  • सम्पूर्ण राज्य प्रशासनिक सुविधा के लिए गढ़ों में विभाजित होता था। (84 ग्रामों का एक गढ़), गढ़ तालुकों या बरहों (बारह ग्रामों का समूह) में, शासन की न्यूनतम इकाई ग्राम थी। 
  • गढ़ाधिपति को दीवान, तालुकाधिपति को दाऊ तथा ग्राम प्रमुख को गौंटिया कहा जाता था। 
  • मंत्री मण्डल- इसमें युवराज, महामंत्री, महामात्य, महासंधिविग्रहक (विदेश मंत्री), महापुरोहित (राजगुरू) जमाबंदी का मंत्री (राजस्व मंत्री), महाप्रतिहार, महासामंत और महाप्रमातृ (राजस्व विभाग) आदि प्रमुख थे।
  • अधिकारी- महाध्यक्ष-सचिवालय का मुख्य अधिकारी, महासेनापति (सेनाध्यक्ष) 
  • दण्डपाशिक- पुलिस विभाग का प्रमुख, महाभंडागारिक, महाकोट्टपाल (दर्ग या किले की रक्षा करने वाला) आदि विभागाध्यक्ष थे। 
  • राज कर्मचारी- प्रायः सभी ताम्रपत्रों में चाट, भट, पिशुन, वेत्रिक आदि राजकर्मचारियों का उल्लेख मिलता है.
  • राजस्व प्रबंध- महाप्रमातृ भूमि की माप करवाकर लगान निर्धारित कराता था। 
  • न्याय व्यवस्था- दांडिक न्याय अधिकारी होता था। 
  • धर्म विभाग- प्रधान अधिकारी महापुरोहित था. दानपत्रों का हिसाब धर्म लेखी कर थे। 
  • यद्ध एवं प्रतिरक्षा प्रबंध- हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, चतुरंगी सेना का संगठन था |
  • पुलिस प्रबंध - दण्ड पाशिक, दुष्ट साधक, सैनिक आदि. |
  • यातायात प्रबंध- यातायात अधिकारी गमागमिक था |
  • स्थानीय प्रशासन- के संचालन हेतु नगरों और गाँवों में एक चुनी हुई पंचकुल नामक पांच सदस्यीय संस्था होती थी, पंचकुल के सदस्य महत्तर एवं प्रमुख महत्तम कहलाता था। निर्णयों के क्रियान्वयन हेतु मुख्य पुलिस अधिकारी, तहसीलदार, लेखक या करणिक, शुल्क ग्राहक तथा प्रतिहारी या सिपाही होते थे।
  • नगर के प्रमुख अधिकारी को पुरप्रधान, ग्राम प्रमुख को ग्राम कूट या ग्राम भौगिक, कर वसूल करने वाले को शौल्किक कहा जाता था।
  • जुर्माना दण्डपाशिक के द्वारा वसूला जाता था।
  • ग्राम पंचायत और ग्रामीण मुखियों की महत्ता बनी रही।

महत्वपूर्ण बिंदु : कल्चुरी वंश एक नजर में -

  • कल्चुरी वंश - छत्तीसगढ़ में लगभग 900 वर्षों तक शासन 
  • रतनपुर कल्चुरी वंश संस्थापक - कलिंगराज, तुम्माण से शासन 
  • रत्नदेव 1 - रतनपुर की स्थापना कर राजधानी बनायी
  • पृथ्वीदेव 1 - सकलकोसलाधिपति की उपाधि 
  • जाज्वल्यदेव-I - जाज्वल्यपुर नगर, विष्णु मंदिर (अपूर्ण) 
  • पाली शिव मंदिर का जीर्णोद्धार -  जाज्वल्यदेव प्रथम द्वारा 
  • जाज्वल्यदेव-I के सिक्कों पर - श्रीमज्ज जाज्वल्यदेव एवं गजशार्दूल चित्रित 
  • रत्नदेव-II पर आक्रमण - गयाकर्ण तथा अनंतवर्मन चोडगंग द्वारा 
  • पृथ्वीदेव-II - राजीव लोचन मंदिर का जीर्णोद्धार 
  • जाज्वल्यदेव-II - त्रिपुरी शासक जयसिंह देव का आक्रमण 
  • रत्नदेव-III - गंगाधर द्वारा लक्ष्मणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार 
  • बाहरेन्द्र साय - कोसंगा या कोसगई राजधानी बनाया 
  • कल्याण साय - 8 वर्ष जहांगीर के दरबार में, जमाबंदी पुस्तिका का अध्ययन मि.चिशम द्वारा 
  • रतनपुर कल्चुरी का अंतिम शासक - रघुनाथ सिंह 
  • भास्कर पंत का आक्रमण - 1741 में रघुनाथ सिंह पर 
  • मोहन सिंह - मराठा अधीन रतनपुर का अंतिम शासक 
  • रायपुर कल्चुरी शाखा के संस्थापक- केशवदेव 
  • खल्लारी अभिलेख - ब्रह्मदेव राय का 
  • रायपुर शहर की स्थापना - रामचंद्र देव द्वारा ब्रह्मदेव राय के नाम पर 
  • रायपुर शाखा का अंतिम शासक - अमरसिंह (1750) 
  • कल्चुरी शासन व्यवस्था - राष्ट्र, विषय, जनपद, मंडल,राजा को सलाह देने के लिए अमात्य मंडल
  • प्रमुख मंत्री - महाप्रमातृ (राजस्व विभाग प्रमुख), महासेनापति (सेना अध्यक्ष), दंडपाशिक (पुलिस प्रमुख)
  • गढ़ व्यवस्था - गढ़ (84 गांव) प्रमुख दीवान, बरहा या तालुका (12 गांव) प्रमुख दाऊ, ग्राम प्रमुख गौटिया
  • स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था - पंचकुल, प्रमुख महत्तम
  • कलचुरियों की कुल देवी - गजलक्ष्मी

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