Chhattisgarh ke Rajvansh | छत्तीसगढ़ के स्थानीय राजवंश की पूरी जानकारी Hindi में

छत्तीसगढ़  के राजवंश - हेल्लो दोस्तों, आज की इस लेख में हम आपको छत्तीसगढ़ के प्रमुख राजवंश के बारे में  जानकारी देंगे, जोकि छत्तीसगढ़ में आयोजित होने वाली सभी Exams के लिए बहुत ही उपयोगी और महत्वपूर्ण साबित होगी | तो दोस्तों हमारे लेख को अंत तक जरुर पढ़े ताकि आपको पूरी जानकारी मिल सके |

Chhattisgarh ke Rajvansh | छत्तीसगढ़ के स्थानीय राजवंश की पूरी जानकारी Hindi में

Chhattisgarh ke Rajvansh | छत्तीसगढ़ के स्थानीय राजवंश -

राजर्षितुल्यकुल वंश -

  • प्राचीन छत्तीसगढ़ में राजर्षितुल्यकुल वंश या सूर शासकों का शासन था. 
  • राजर्षितुल्यकुल वंश ने दक्षिण कोसल पर संभवतः 5वीं से 6वीं शताब्दी तक शासन किया.
  • भीमसेन द्वितीय के आरंग ताम्रपत्र से यह प्रतीत होता है कि सूर वंश के छह शासकों ने दक्षिण कोसल में ईसा के बाद पांचवीं तथा छठवीं शताब्दी के दौरान राज्य किया था. ये सूर, दायित प्रथम, विभीषण, भीमसेन प्रथम, दायितवर्मन द्वितीय तथा भीमसेन द्वितीय थे जिन्हें सनद में ऐसे परिवार के बताया गया है, जो राज्ययोगी (राजर्षि तुल्य कुल) से कम नहीं था. इस उपाधि की तुलना चन्द्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरि गुफा शिलालेख की राजाधिराज श्री उपाधि से की जा सकती है. 
  • इस लेख में तिथि संवत् 182 अथवा 282 अंकित है जो अस्पष्ट है. यदि इसे संवत् 182 माना जाये तो इस वंश का उदय पांचवीं शताब्दी में एवं तिथि 282 मानने पर छठवीं शताब्दी माना जा सकता है. 
  • ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि राजर्षितुल्यकुल वंश के शासकों ने गुप्त संवत् का प्रयोग किया जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस वंश के शासकों ने गुप्त अधिसत्ता स्वीकार कर ली थी. 
  • प्रमुख शासक- सूर, दायित प्रथम, विभीषण, भीमसेन प्रथम, दायितवर्मन द्वितीय तथा भीमसेन द्वितीय  |
नलवंश -

  • दक्षिण कोसल के दक्षिण (बस्तर क्षेत्र) में नलवंश का शासन लगभग 5वींसदी तक रहा है.
  • राजिम में प्राप्त अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि नलवंश का प्रारम्भ नल नामक राजा से हआ। विलासतुंग और उनके पूर्वजों को भी नलवंश का कहा गया। नल शासक भवदत्त वर्मन और उसके बाद स्कंद वर्मन द्वारा नलवंश की राजधानी पकी (भोपालपट्टनम) को बनाया. 
  • इतिहासकारों की मान्यता है कि विलासतुंग (राजिम अभिलेख) नल वंश का महत्वपूर्ण शासक था विलासतुंग पांडुवंशीय महाशिवगुप्त बालार्जुन का समकालीन था उसने राजिम के राजीव लोचन मंदिर का निर्माण करवाया.
  • नलवंशी शासक वाकाटकों के समकालीन थे इनकी शक्ति का मुख्य केन्द्र बस्तर था। इस काल के लेखों से ज्ञात होता है कि इस वंश का प्रमुख शासक भवदत्त वर्मन था, जिसने बस्तर और कोसल क्षेत्र में राज्य करते हुए अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
  • प्राप्त अभिलेखों में स्कन्द वर्मन को इस वंश का शक्तिशाली शासक बताया गया है।
  • नलवंशी नरेश बस्तर और दक्षिण कोसल में काफी समय तक राज्य करते रहे। सम्भवतः उनका राज्य सोमवंशियों द्वारा पराजित होने के बाद समाप्त हो गया. 
  • प्रमुख शासक- भवदत्त वर्मन, अर्थपति भट्टारक, स्कंदवर्मन, स्तम्भराज, नंदराज, पृथ्वीराज, विरूपाक्ष, विलासतुंग, भीमसेन, नरेन्द्र धवल |
शरभपुरीय वंश -
  • ईसा के बाद छठवीं शताब्दी में शरभपुरीय वंश का शासन था. यह नाम उनकी राजधानी शरभपुर के नाम पर पड़ा था. शरभपुर सम्भवत: रायपुर जिले के सिरपुर के समीप था.
  • नरेन्द्र के पिता शरभ ने इस राजवंश की स्थापना की.
  • राजवंश का दूसरा शासक प्रसन्नमात्र था. जिसने सोने का पानी चढे तथा चाँदी के सिक्के प्रचलित करवाये, इन पर गरूड़, शंख तथा चक्र के निशान अंकित थे. 
  • प्रसनमात्र का उत्तराधिकारी उसका पुत्र महाजयराज था और उसके बाद उसका भाई मनमात्र या दुर्गराज उसका उत्तराधिकारी हुआ, उसके बाद सुदेवराज तथा महाप्रवरराज शासक हुए। 
  • ठाकुरदिया (रायगढ़ जिले की सारंगढ़ तहसील का एक गाँव) पट्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ क्षेत्र अन्तिम ज्ञात शरभपुरीय शासक महा प्रवरराज द्वितीय के समय तक इस राजवंश के आधिपत्य में था। 
  • इस वंश के अंतिम राजा सुदेवराज के समय में पाण्डुवंशियों ने दक्षिण कोसल पर विजय प्राप्त कर शरभपुरीय राजवंशों को समाप्त कर दिया और श्रीपुर को अपनी राजधानी बनाया. (स्रोत- प्राचीन छत्तीसगढ़ ले. प्यारेलाल गुप्त) 
  • शरभपुरियों ने वर्तमान बिलासपुर, रायपुर तथा रायगढ क्षेत्र में शासन किया. इस वंश के शासकों ने महा की उपाधि धारण की. 
  • इन शासकों के सभी शिलालेख, 8वीं तथा 9वीं शताब्दी ई. में प्रचलित बाक्स हेडेड अल्फाबेट्स में हैं।
  • ६वीं शताब्दी में शरभपरीय शासकों के पश्चात् दक्षिण कोसल में पाण्डुवंश का राज्य स्थापित हुआ.
  • प्रमुख शासक - नरेन्द्र, प्रसन्नमात्र, जयराज, मनमात्र, दुर्गराज, सुदेवराज, प्रवरराज,
  • प्रवरराज द्वितीय |
पाण्डुवंश -
  • पाण्डुवंश की स्थापना उदयन ने की जबकि वास्तविक संस्थापक इंद्रबल था. बाद के एक शासक तीवरदेव ने कोसल और उत्कल को जीतकर सकलकोसलाधिपति की उपाधि धारण की. इसी वंश में हर्षगुप्त नामक शासक हुआ. 
  • हर्षगुप्त के पश्चात् उसका पुत्र महाशिवगुप्त बालार्जुन (595-655 ई.) राजा हुआ. बाल्यावस्था में ही धनुर्विद्या में पारंगत होने के कारण वह बालार्जुन कहलाया. उसने दीर्घकाल तक शासन किया, अभिलेखों के अनुसार उसने पृथ्वी को जीत लिया था. महाशिवगुप्त के 27 ताम्रपत्र सिरपुर से मिले हैं. किसी एक शासक के इतने ताम्रलेख अब तक कहीं प्राप्त नहीं हुए हैं. 
  • महाशिवगुप्त के शासनकाल में ही हर्षगुप्त की मृत्योपरांत हर्ष की रानी वासटा ने अपनी पति की स्मृति में सिरपुर में प्रख्यात लक्ष्मण मंदिर का निर्माण कराया जो एक विष्णु मंदिर है. यह प्राचीन भारतीय शिल्प कला के उत्कृष्ट उदाहरणों में एक है. यह भारत में ईंटों से निर्मित पहला मंदिर है। 
  • इस काल की धातु प्रतिमाएँ कला की दृष्टि से अद्वितीय कही जा सकती हैं. सिरपुर से प्राप्त तारा की धातु प्रतिमा धातु कला का उत्कृष्ट उदाहरण है. 
  • इस वंश के ज्यादातर शासक वैष्णव थे, महाशिवगुप्त शैव मत का अनुयायी था परन्तु वह अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु था. इसकी राजधानी श्रीपुर एवं अन्य स्थलों में शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन धर्मों से संबंधित अनेक स्मारकों, कृतियों का निर्माण हुआ. 
  • श्रीपुर इस काल में बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में भी प्रख्यात था. सिरपुर उत्खनन से विशाल बौद्ध प्रतिमाएँ, विहार एवं शिलालेख प्राप्त हुए हैं. 
  • महाशिवगुप्त बालार्जुन के कार्यकाल में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन-त्सांग ने 639 ई. में इस क्षेत्र की यात्रा की, छत्तीसगढ़ का उल्लेख उसने किआ-स-लो के नाम से किया है. 
  • महाशिवगुप्त बालार्जुन का काल दक्षिण कोसल के इतिहास का स्वर्णकाल माना जाता है. महाशिवगुप्त बालार्जुन के पश्चात् संभवतः पाण्डुवंशियों का पतन हो गया. 
  • प्रमुख शासक- उदयन, ईशानदेव, नन्नराज/नन्नदेव प्रथम, महाशिव तीवरदेव, नन्नदेव द्वितीय, चंद्रगुप्त, हर्षगुप्त, महाशिवगुप्त बालार्जुन |
सोम वंश -
  • सिरपुर के पाण्डु शासकों के पतन के पश्चात् 9-11वीं शताब्दी ई. के लगभग दक्षिण कोसल पर सोमवंशी शासकों का राज्य स्थापित हुआ. कुछ इतिहासकार सोमवंशीय शासकों को पाण्डुवंश की एक शाखा के रूप में व्यक्त करते हैं.
  • शिवगुप्त इस वंश का पहला प्रतापी शासक था। उसके बाद जन्मेजय महाभवगुप्त प्रथम कोसल का राजा हुआ, जिसने इस राजवंश की प्रतिष्ठा बढ़ाई। उसने ओडिशा को जीता और ''त्रिकलिंग का अधिपति'' कहलाया, इसने परमभट्टारक, महाराजाधिराज, सोमकुलतिलक की उपाधि भी रखी. 
  • दक्षिण के राजा राजेन्द्र चोल ने इंद्ररथ के काल में इस क्षेत्र पर आक्रमण कर कोसल तथा उत्कल को अपने आधिपत्य में ले लिया. बाद में परवर्ती सोमवंशी शासक महाशिवगुप्त चंडीहर ने अपने वंश के वैभव को पुनर्स्थापित किया. महाशिवगुप्त कर्ण केसरी इस वंश के अंतिम शासक थे. 
  • 11 वीं सदी में तुम्माण के कल्चुरियों एवं ओडिशा के शासक अनंतवर्मन चोडगंग द्वारा सोमवंश के शासकों को परास्त कर उनके क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया गया. 
  • प्रमुख शासक- शिवगुप्त, महाभवगुप्त-प्रथम जन्मेजय, ययाति, भीमरथ, धर्मरथ, नहुष, इन्द्ररथ, चण्डीहर, उद्योत केसरी, कर्ण केसरी |
कांकेर के सोम वंश -
  • इस वंश के शासकों ने कांकेर क्षेत्र में अपना शासन स्थापित किया. इस वंश का संस्थापक सिंहराज को माना जाता है. व्याघ्रराज, बोपदेव, कर्णराज, कृष्णराज, सोमराज अन्य प्रमुख शासक थे.
  • प्रमुख शासक- सिंहराज, व्याघ्रराज, बोपदेव, कर्णराज, कृष्णराज, सोमराज |
बाणवंश -
  • इस वंश का प्रभाव पाली (कोरबा) क्षेत्र में रहा, इसके संस्थापक मल्लदेव थे |
  • इस वंश का प्रमुख शासक विक्रमादित्य जयमऊ जिसने पाली के शिव निर्माण कराया।
  • कलचुरि शासक शंकरगण द्वितीय ने बाण वंशियों को पराजित किया।
  • प्रमुख शासक- मल्लदेव, विक्रमादित्य जयमऊ |
नागवंश -

छत्तीसगढ़ में नागवंश की दो शाखाओं के शासन का उल्लेख मिलता है -
  1. कवर्धा में फणिनाग वंश 
  2. बस्तर में छिंदकनाग वंश |
बस्तर के छिंदकनाग वंश -
  • बस्तर का प्राचीन नाम चक्रकोट या भ्रमरकोट था। यहाँ नागवंशियों का शासन था. नागवंशी शासकों को छिंदक या सिदवंशी, चक्रकोट का राजा भी कहा जाता था।
  • चक्रकोट में छिंदक नाग वंश की सत्ता 400 वर्षों तक कायम रही। वे दसवी सदा आरम्भ से सन् 1313 ई. तक शासन करते रहे। 
  • इस वंश के बारे में जानकारी करूसपाल अभिलेख (सोमेश्वर देव प्रथम), सती अभिलेख (हरिचंद्र देव), एर्राकोट अभिलेख (तेलुगू) आदि से प्राप्त होती है |
  • इस वंश की राजधानी भोगवतीपुरी थी. इस वंश के शासकों ने बारसूर (जि. दंतेवाडा में शिव मंदिर, मामा-भांजा मंदिर बत्तीसा मंदिर चन्दादित्येश्वर मंदिर एव तालाबो का निर्माण कराया गया |
  • छिंदक नागों में सर्वाधिक में सर्वाधिक प्रसिद्ध राजा सोमेश्वरदेव था। उसने अपने पराक्रम के बल पर एक विशाल राज्य की स्थापना की, उसने उडू, वेंगि, लंजि, रतनपुर आदि के शासकों पराजित किया परन्तु स्वयं जाज्वलयदेव से पराजित हुआ। वह रचनात्मक कार्यों में रुचि रखता था। उसने मंदिरों का निर्माण करवाया। 
  • सोमेश्वर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कन्हरदेव सिंहासनारूढ़ हुआ। सम्भवतः उसका कार्यकाल 1111 ई. से 1122 ई. के बीच रहा. 
  • कन्हरदेव के बाद जयसिंह देव, नरसिंह देव, कन्हर देव द्वितीय शासक बने। इस वंश का अन्तिम शासक हरिश्चन्द्र देव हुआ जिसे वारंगल के चालुक्य अन्नमदेव (काकतीय) ने परास्त कर छिंदकनाग वंश की सत्ता का अंत किया.
  • प्रमुख शासक- मधुरांतक देव, सोमेश्वर देव, जगदेव भूषण धारावर्ष, कन्हर देव, जय सिंह देव, नरसिंह देव, हरिश्चन्द्र देव |
कवर्धा के फणिनाग वंश -
  • नागवंशियों की एक शाखा फणिनाग वंश ने 9 वीं से 15 वीं सदी तक कवर्धा के क्षेत्र के आस-पास शासन किया. इस वंश का संस्थापक अहिराज को माना जाता |
  • प्रमुख शासकों में गोपाल देव, रामचन्द्र देव, धरमराज सिंह, मोहिंम देव आदि थे |
  • यह वंश कल्चरी वंश की प्रभुसत्ता स्वीकार करता था. इस वंश के शासकों ने मडवा महल,भोरमदेव मंदिर आदि का निर्माण कराया. इस वंश के शासकों संबंध कल्चुरियों से रहे.
  • प्रमुख शासक- अहिराज, गोपाल देव, रामचन्द्र देव, धरमराज सिंह, मोहिम देव |
चालुक्य (काकतीय) वंश -
  • वारंगल के चालुक्य वंश के अन्नमदेव ने बारसूर के शासक छिंदकनाग वंश के हरिश्चन्द्र देव को 1313 ई. में परास्त किया। 
  • अन्नमदेव 1314 ई. में सत्तासीन हुआ और बस्तर में चालुक्य (काकतीय) वंश की नींव रखी. उसने दंतेवाड़ा में प्रसिद्ध दंतेश्वरी मंदिर का निर्माण कराया. 
  • अन्नमदेव : काकतीय वंश का संस्थापक, राजधानी बारसूर से दंतेवाड़ा स्थानांतरित किया, मंधोता उसकी अल्पकालीन राजधानी थी। 
  • पुरूषोत्तम देव 'रथपति' : गोन्चा ( रथयात्रा) और दशहरा पर्व का आरंभ। 
  • दिकपाल देव : राजधानी चक्रकोट से बस्तर स्थानांतरित किया। 
  • राजपाल देव : प्रौढ़ प्रताप चक्रवर्ती की उपाधि। 
  • दलपत देव : राजधानी बस्तर से जगदलपुर स्थानांतरित किया, बस्तर राज्य इसी समय मराठों के प्रभाव में आया.
  • दलपत सागर का निर्माण कराया।
  • दरियावदेव : बस्तर राज्य भोंसले शासन का करद राज्य बना, अजमेर सिंह समर्थक हल्बा आदिवासियों द्वारा डोंगर विद्रोह (1774-78), भोपालपट्टनम संघर्ष (1795) 
  • महिपाल देव : परलकोट विद्रोह (1825) हुआ, नरबलि प्रथा के कारण भोंसला प्रशासन द्वारा दण्डित। 
  • रूद्र प्रताप देव : सेंट ऑफ जेरूसलम की उपाधि, इसके शासनकाल में भूमकाल विद्रोह (1910) हुआ। 
  • प्रफुल्ला कुमारी देवी : छत्तीसगढ़ में एकमात्र महिला शासिका। 
  • प्रवीरचंद्र भंजदेव : 1948 में बस्तर रियासत का भारत संघ में विलय। 
  • इस वंश के शासकों ने बस्तर क्षेत्र में सर्वाधिक समय तक शासन किया। जुगराज कंवर (रानी चोरिस) ने अपने पति राजा भैरम देव के विरूद्ध विद्रोह किया।
  • प्रमुख शासक- अन्नमदेव, पुरूषोत्तमदेव, दिकपालदेव, राजपालदेव, दलपतदेव, दरियावदेव, अजमेर सिंह, महिपाल देव, रूद्रप्रताप देव, प्रफुल्ला कुमारी देवी, प्रवीरचंद्र भंजदेव |

छ.ग के प्रमुख राजवंश से जुडी महत्वपूर्ण बिंदु : एक नजर में-

  1. राजर्षितुल्यकुल वंश - शूर, दायित प्रथम, विभीषण, भीमसेन प्रथम, दायितवर्मन द्वितीय, भीमसेन द्वितीय 
  2. नलवंशीय प्रमुख शासक - भवदत्त वर्मन, स्कंद वर्मन, विलासतुंग 
  3. नलवंश संबंधी प्रमाण - राजिम अभिलेख, ऋद्धिपुर ताम्रपत्र, पोड़ागढ़, केसरीबेड़ा ताम्रपत्र, पांडियापाथर ऐतिहासिक स्त्रोत। सिक्के (एडेंगा, कुलिया) 
  4. शरभपुरीय प्रमुख शासक - शरभराज, नरेन्द्र, प्रसन्नमात्र, दुर्गराज, सुदेवराज, प्रवरराज, प्रवरराज द्वितीय आदि |
  5. शरभपुरीय राजधानी थी - श्रीपुर या सिरपुर 
  6. शरभपुरीय धारण करते थे - महा की उपाधि 
  7. प्रसन्नपुर की स्थापना की  -  प्रसन्नमात्र ने 
  8. राजीव लोचन मंदिर - राजिम में विलासतुंग द्वारा 
  9. तीवरदेव ने धारण की - सकलकोसलाधिपति की उपाधि 
  10. छत्तीसगढ़ का स्वर्ण काल -  महाशिवगुप्त (पाण्डुवंश) के शासन को 
  11. सोमवंशी धारण करते थे - त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि 
  12. कांकेर का सोमवंश -संस्थापक – सिंहराज 
  13. पाली के शिव मंदिर निर्माण - विक्रमादित्य जयमऊ (बाणवंश) 
  14. भोरमदेव मंदिर का निर्माण - गोपाल देव के काल में (11वीं सदी) 
  15. भोरमदेव मंदिर को कहते हैं - छत्तीसगढ़ का खजुराहो
  16. भोरमदेव मंदिर की निर्माण शैली - नागर शैली 
  17. मड़वा महल (दूल्हादेव मंदिर) - 14वीं सदी, रामचंद्र देव द्वारा 
  18. छिंदक नागवंश प्रमुख शासक - मधुरांतक देव, सोमेश्वर देव, हरीशचंद्र देव 
  19. छिंदक नागवंशी निर्माण - मामा भांजा मंदिर, बत्तीसा मंदिर, चंद्रादित्येश्वर मंदिर आदि 
  20. अंतिम छिंदक नागवंश - हरीश्चंद्र देव, अन्नमदेव द्वारा पराजित 
  21. काकतीयवंश का संस्थापक - अन्नमदेव
  22. दंतेश्वरी मंदिर की स्थापना -  अन्नमदेव द्वारा 
  23. पुरूषोत्तम देव द्वारा आरंभ - गोन्चा पर्व व बस्तर का दशहरा 
  24. छत्तीसगढ़ की एकमात्र शासिका - प्रफुल्ला कुमारी देवी 
  25. रतनपुर के नाम - मणिपुर, मणिकपुर, हीरापुर, चतुर्युगीपुर तथा कुबेरपुर

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