Chhattisgarh ka Prachin Itihas | छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास की पूरी जानकारी Hindi में

छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास - हेल्लो दोस्तों, आज की इस लेख में हम आपको Chhattisgarh ka Prachin Itihas की जानकारी देंगे, जोकि छत्तीसगढ़ में आयोजित होने वाली सभी Exams के लिए बहुत ही उपयोगी और महत्वपूर्ण साबित होगी | तो दोस्तों हमारे लेख को अंत तक जरुर पढ़े ताकि आपको पूरी जानकारी मिल सके |

Chhattisgarh ka Prachin Itihas

छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास की पूरी जानकारी Hindi में (Step by Step) -

प्रागैतिहासिक काल में छत्तीसगढ़ -

प्रागैतिहासिक काल उस अवस्था के लिए प्रयोग में आने वाला शब्द है जिसके संदर्भ में हमें कोई लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं है. इस अवस्था के अनेक प्रमाण छत्तीसगढ़ से भी मिले हैं. प्रागैतिहासिक काल में जब मनुष्य गुफाओं में निवास करता था, तब उसने इन शैलाश्रयों में अनेक चित्र बनाए, इसके अलावा इस काल के विविध औजार एवं स्मारक भी छत्तीसगढ़ में मिले हैं

  • रायगढ़ जिले के सिंघनपुर तथा कबरा पहाड़ में अंकित शैलचित्र इसके प्रख्यात उदाहरण हैं. सिंघनपुर की चित्रकारी गहरे लाल रंग की है, इसमें शिकार दृश्य का अंकन है. सिंघनपुर में मानव आकृतियाँ, सीधी, डंडे के आकार की तथा सीढ़ी के आकार में अंकित की गई हैं. कबरा पहाड़ पर भी लाल रंग से विभिन्न चित्रों यथा छिपकिली, घड़ियाल, सांभर, अन्य पशुओं तथा पंक्तिबद्ध मानव समूह सहित प्रतीकात्मक चित्रांकन किया गया है. 
  • राजनादगाँव के चितवाडोंगरी, रायगढ़ के समीप बसनाझर, ओंगना, करमागढ़ तथा लेखापाड़ा, सरगुजा के रामगढ़ पहाड़ी में जोगीमारा गुफा आदि में शैलचित्र मिले हैं. 
  • सरगुजा के समीप रामगढ़ पहाड़ी में जोगीमारा गुफा में अधिकांश चित्र गेरूए रंग के हैं, जिसमें पशु-पक्षी, वृक्ष आदि के साथ सामाजिक जीवन की अभिव्यक्ति के चित्र हैं. इनका काल ईसापूर्व दूसरी या तीसरी शताब्दी माना जाता है.
  • पाषाण युग के औजार महानदी घाटी तथा रायगढ़ जिले के सिंघनपुर से प्राप्त हुए हैं. मध्य पाषाण युग के कुछ औजार जैसे लम्बे फलक, अर्द्धचंद्राकार, लघु पाषाण औजार कबरा पहाड़ क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं.
  • महानदी घाटी बिलासपुर संभाग के धनपुर तथा रायगढ़ जिले के सिंघनपुर में स्थित चित्रित शैलाश्रय के निकट से उत्तर पाषाण युग के लघुकृत पाषाण औजार प्राप्त हुए है |
  • नव पाषाण काल के चित्रित हथौड़े दुर्ग के समीप अर्जुनी, राजनांदगाँव र बोनटीला, चितवाडोंगरी तथा रायगढ़ के टेरम नामक स्थान से प्राप्त हुए है. 
  • लौह युगीन अवस्था में शव गाड़ने के लिए बड़े-बड़े शिलाखंडों का प्रयोग किया जाता था. इसे महापाषाण स्मारक के नाम से संबोधित किया जाता है. दुर्ग के समीप करहीभदर, चिरचारी और सोरर में पाषाण घेरों के अवशेष मिले हैं. इसी के समीप करकाभाटा से पाषाण घेरे के साथ लोहे के औजार और मृद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं |धनोरा नामक स्थल के उत्खनन से लगभग 500 महापाषाणयुगीन स्मारक प्राप्त हुए हैं. 
  • बस्तर क्षेत्र से अनेक काष्ठ स्तम्भ भी मिले हैं, जो वीर नायकों के सम्मान में स्थापित किए गये थे. मसेनार, डिलमिली, चित्रकूट किलेपाल, तारागाँव, चिंगेनार आदि से ये स्मारक मिले हैं.

छत्तीसगढ़ में पाषाण कालीन साक्ष्य एक नजर में -

  • पूर्व पाषाण काल - रायगढ़ के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, बोतल्दा, छापामाड़ा, भंवरखोल, गीधा, सोनबरसा . 
  • मध्य पाषाण काल - गढ़धनौरा, गढ़चंदेला, कालीपुर, राजपुर, भातेवाड़ा, खड़ागघाट, घाटलोहांग 
  • उत्तर पाषाण काल - रायगढ़ के कबरा पहाड़, सिंघनपुर, महानदी घाटी, धनपुर, करमागढ़, बसनाझर, आंगना, बोतल्दा 
  • नवपाषाण काल - अर्जुनी (दुर्ग), टेरम (रायगढ़), बोनटीला, चितवाडोंगरी (राजनांदगाँव) 
  • लौह युगीन पाषाण स्तंभ - करहीभदर, चिररारी, सोरर, करकाभाटा, धनारा 
  • राज्य में सर्वाधिक शैलचित्र - रायगढ़ जिले से प्राप्त 
  • प्राचीनतम शैलाश्रय -  सिंघनपुर (रायगढ़)
वैदिक युगीन में छत्तीसगढ़ -

पूर्व वैदिक काल के स्रोतों में छत्तीसगढ़ क्षेत्र की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं उत्तर वैदिक काल में दक्कन क्षेत्र का उल्लेख दक्षिण दिक् नाम से प्राप्त होता है. उत्तर वैदिक साहित्यों में नर्मदा नदी का उल्लेख रेवा के नाम से मिलता है. रामायण, महाभारत और पुराणों में छत्तीसगढ़ की जानकारी अधिक विस्तार से प्राप्त होती है.. 
  • रामायण काल में विंध्य पर्वत के दक्षिण में कोसल नामक एक शक्तिशाली राजा था. इसी से इस क्षेत्र का नाम कोसल पड़ा. इसी वंश में राजा भानुमंत हुए जिनकी पुत्री कौशल्या थी. कौशल्या राजा दशरथ की तीन रानियों में प्रथम एवं राम की माता थी. भानुमंत का कोई पुत्र न होने के कारण कोसल राज्य दशरथ के राज्य में मिल गया. इस तरह यह अयोध्या का हिस्सा बना और कालान्तर में राम यहाँ के भी शासक हुए. 
  • स्थानीय अनुश्रुतियों के अनुसार राम के 14 वर्षीय वनवास का अधिकांश समय इसी क्षेत्र में व्यतीत हुआ. राम ने शिवरीनारायण की यात्रा की थी और यहीं सबरी के जूठे बेर खाए थे. इस प्रसंग को शिवरीनारायण से जोड़कर देखा जाता है. शिवरीनारायण के साथ ही खरौद का रामकथा से सम्बन्ध माना जाता है. 
  • जन-मान्यता के अनुसार लव और कुश का जन्म तुरतुरिया (बारनवापारा) में हुआ था. राम के बाद लव उत्तर कोसल और कुश दक्षिण कोसल के शासक हुए. कश की राजधानी कुशस्थली थी. छत्तीसगढ़ दक्षिण कोसल का हिस्सा था. 
  • महाभारत में भी कोसल, प्राक्कसिल, कातर राज्य (बस्तर क्षेत्र) का उल्लेख है |
  • महाभारत कालीन ऋषभ तीर्थ भी जांजगीर जिले में सकती के निकट ही स्थित था |
  • कर्ण की विजय यात्रा, राजा नल, शिशुपाल के संदर्भ में कोसल का उल्लेख आया है.
  • महाभारत काल में मणिकपुर (रतनपुर) का शासक मोरध्वज था.
  • सिरपुर महाभारत काल में चित्रांगदपुर कहलाता था. जिस पर पाण्डुवंशी बभ्रुवाहन का शासन था |
  • सिरपुर महाभारत काल में चित्रांगा शासन था. जिस पर पांडू वंशीय बभ्रुवाहन का शासन था |
  • पौराणिक साहित्य में इस क्षेत्र के भूगोल और इतिहास की पर्याप्त जानकारी मिलती है. पौराणिक स्रोतों के अनुसार इस क्षेत्र में इक्ष्वाकुवंशियों का शासन था और यह क्षेत्र मनु अश्वत् के पौत्र विनताश्व को प्राप्त हुआ था.
बुद्धकाल (6वीं शताब्दी ई.पू.) -
  • 'अवदान शतक' ग्रंथ के अनुसार महात्मा बुद्ध दक्षिण कोसल आए थे. हवेनसांग के यात्रा वृत्तांत से ऐसी जानकारी मिलती है.
मौर्य -
  • परवर्ती बुद्धकाल में यह क्षेत्र पहले नंदवंश एवं बाद में मौर्यवंश के अधीन रहा. ह्वेनसांग के विवरण एवं सरगुजा जिले की जोगीमारा एवं सीताबेंगरा गुफाओं के मौर्यकालीन लेखों से स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में मौर्यों का प्रभुत्व रहा होगा. 
  • अकलतरा, बार, ठठारी, बिलासपुर क्षेत्र, तारापुर से मौर्यकालीन आहत सिक्कों की प्राप्ति, मल्हार से पकी ईंटों की दीवार एवं उत्तरी काले पालिशदार बर्तनों के अवशेष भी मौर्यों की अधीनता की पुष्टि करते हैं.
सातवाहन -
  • मौर्यों के बाद प्रतिष्ठान या पैठन (महाराष्ट्र) के सातवाहनों का इस क्षेत्र में शासन रहा. 
  • सातवाहन शासक अपीलक की मुद्रा बालपुर से प्राप्त हुई है, जांजगीर-चांपा जिले में चंद्रपुर के निकट स्थित ग्राम-किरारी से सातवाहन कालीन काष्ठ स्तंभ प्राप्त हुआ है, इस काष्ठ स्तंभ में सातवाहन कालीन अधिकारी और कर्मचारियों के पद का उल्लेख है. जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम-गुंजी से सातवाहन शासक वरदत्तश्री का अभिलेख प्राप्त हुआ है. 
  • इस काल के सिक्के बिलासपुर के मल्हार एवं चकरबेड़ा से प्राप्त हुए हैं. 
  • हवेनसांग के विवरण के अनुसार दार्शनिक नागार्जुन दक्षिण कोसल की राजधानी के निकट निवास करता था. 
  • बाद में संभवत: मेघवंश ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया.
वाकाटक वंश -
  • सातवाहन के पश्चात् वाकाटकों का अभ्युदय हुआ. इनकी राजधानी नंदिवर्धन (नागपुर) था |
  • इस वंश के प्रमुख शासकों में महेन्द्रसेन, रूद्रसेन, प्रवरसेन, नरेन्द्रसेन आदि थे, प्रवरसेन प्रथम ने दक्षिण कोसल के समूचे क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया. 
  • भारत के प्रसिद्ध कवि कालिदास ने प्रवरसेन के आश्रय में कुछ समय बिताया, रामगढ़ की पहाड़ी से इनका संबंध माना जाता है.
  • वाकाटक वंश के शासकों का संघर्ष नलवंशीय शासकों से होता रहता था।
गुप्तकाल -
  • गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त (4सदी ई.) के दरबारी कवि हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के दक्षिणापथ अभियान का उल्लेख है. इस अभियान के दौरान समुद्रगुप्त ने दक्षिण कोसल के शासक महेन्द्र एवं महाकान्तार (बस्तर क्षेत्र) के शासक व्याघ्रराज को परास्त किया. पर इस क्षेत्र का गुप्त साम्राज्य में विलय नहीं किया गया. 
  • बानबरद (जि. दुर्ग) एवं आरंग (जि. रायपुर) से प्राप्त गुप्तकालीन सिक्कों से भी स्पष्ट होता है कि यहाँ के क्षेत्रीय शासकों ने गुप्तवंश का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया था.
कुषाण वंश -
  • तेलीकोट, (खरसिया) से कनिष्क कालीन स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुए है, बिलासपुर से भी कुषाण कालीन तांबे के सिक्के प्राप्त हुए है।
छ.ग की प्राचीन काल से जुडी महत्वपूर्ण बिंदु : एक नजर में -
  1. छत्तीसगढ़ के प्रथम पुरातत्वेत्ता - लोचन प्रसाद पांडे 
  2. छत्तीसगढ़ के प्रथम इतिहासकार - बाबू रेवाराम 
  3. प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्र - सिंघनपुर गुफा, जि. रायगढ़ 
  4. पुरापाषाण कालीन अवशेष - सिंघनपुर, कबरा पहाड़, बोतल्दा, सोनबरसा 
  5. मध्य पाषाण कालीन अवशेष - कालीपुर, राजपुर, गढ़धनोरा, गढ़चंदेला, खड़ागघाट 
  6. उत्तर पाषाण कालीन अवशेष - कबरा पहाड़, सिंघनपुर, बोतल्दा, महानदी घाटी, आंगना, कर्मागढ़ 
  7. नवपाषाण कालीन अवशेष - अर्जुनी (दुर्ग), बोनटीला, चितवा डोंगरी (राजनांदगांव), टेरम (रायगढ़) 
  8. रामायण कालीन छत्तीसगढ़ - कोसल तथा दक्षिण कोसल 
  9. महाभारत कालीन छत्तीसगढ़ - प्राक्कोसल, कांतर (बस्तर) 
  10. बस्तर क्षेत्र का प्राचीन नाम - चक्रकोट, महाकांतर, एककांतर, भ्रमरकोट 
  11. मौर्यकालीन साक्ष्य - रामगिरी पहाड़ी जिला-सरगुजा 
  12. रामगिरी पहाड़ी में स्थित गुफा - जोगीमारा एवं सीताबेंगरा गुफा 
  13. जोगीमारा गुफा में उल्लेख है - सुतनुका तथा देवदीन के प्रेम प्रसंग का 
  14. जोगीमारा अभिलेख की भाषा - भाषा पालि तथा लिपि ब्राह्मी 
  15. विश्व की प्राचीनतम नाट्यशाला - सीता बेंगरा गुफा में 
  16. प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार - कोसल का शासक- महेंद्र & महाकांतर का शासक- व्याघ्रराज 
  17. सातवाहन वंश संबंधी प्रमाण - बालपुर से प्राप्त मुद्रा, गंजी का शिला 
  18. सातवाहन कर्मचारियों की सूची - किरारी के काष्ठ स्तंभ में

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