Pragaitihasik Kal in Hindi | प्रागैतिहासिक काल की पूरी जानकारी Hindi में

Pragaitihasik Kal in Hindi PDF- हेल्लो दोस्तों, आज की इस लेख में हम आपको इतिहास (History) के अंतर्गत Pragaitihasik Kal (प्रागैतिहासिक काल) के Topic पर पूरी जानकारी देंगे | तो दोस्तों हमारे लेख को अंत तक जरुर पढ़े ताकि आपको पूरी जानकारी मिल सके |

Pragaitihasik Kal in Hindi | प्रागैतिहासिक काल की पूरी जानकारी Hindi में

Pragaitihasik Kal (प्रागैतिहासिक काल) -

प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Era)- प्रागैतिहासिक काल वह काल है जिसकी जानकारी हमें पुरातात्विक स्रोतों से प्राप्त होती है। इस समय के इतिहास की जानकारी लिखित रूप में प्राप्त नहीं हुई है। इस काल में विषय में जो भी जानकारी मिलती है वह पाषाण के उपकरणों, मिट्टी के बर्तनों, खिलौने आदि से प्राप्त होती है। प्रागैतिहासिक काल को ‘प्रस्तर युग’ भी कहते हैं।

  • प्रागैतिहासिक काल का अर्थ होता है ‘इतिहास से पूर्व का काल या युग’
  • प्रागैतिहासिक काल का समय 5,00,000 ई.पू. से 2,500 ई.पू. तक माना जाता है।

प्रागैतिहासिक काल को तीन भागों में विभाजित किया गया है -

  1. पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age) – 5,00,000 ई.पू. से 50,000 ई.पू. तक (आखेटक एवं खाद्य संग्राहक)
  2. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) – 10,000 ई.पू. से 7000 ई.पू. तक (आखेटक एवं पशु पालक)
  3. नवपाषाण काल (Neolithic Age) – 9,000 ई.पू. (विश्व) व 7,000 ई.पू. (भारत) से 2,500 ई.पू. तक (खाद्य उत्पादक, स्थिर एवं समुदाय में रहना)

1. पुरापाषाण काल -

पुरापाषाण काल को भी तीन में बाँटा जा गया है -

A. निम्न पुरापाषाण काल - 

  • इस काल का कालखंड 5,00,000 ई.पू. से 50,000 ई.पू. तक मानाजाता है |
  • इस काल में मानव ने आग का अविष्कार कर चूका था।
  • मानव समूह बनाकर शिकार करते थे और भोजन का संग्रह करते  थे |
  • यहाँ प्रमुख स्थलो में से कश्मीर, राजस्थान का थार, उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में स्थित बेलन घाटी, भीमबेटका की गुफाएँ, नर्मदा घाटी (मध्य प्रदेश), सोहन नदी घाटी, कर्णाटक एवं आंध्रप्रदेश आदि है।
  • इस काल में शिकार के दौरान उपयोग किये जाने वाले हथियारों में से प्रमुख रूप से क्वार्ट्जाइट पत्थर के बने कुल्हाड़ी, हस्त कुल्हाड़ी या हस्त कुठार (hand-axe), खण्डक (गँड़ासा) (Chopper) है।

B. मध्य पुरापाषाण काल -

  • इस काल का कालखंड 50,000 ई.पू. से 40,000 ई.पू. तक मानी जाती है।
  • इस काल को फलक संस्कृति (Flake Culture) के नाम से भी जाना जाता है |
  • इस काल के लोगो ने आग का प्रयोग व्यापक रूप में किया करने लगे |
  • इस काल में पत्थर के गोले से वस्तुओं का निर्माण होने लगा था।
  • यहाँ प्रमुख स्थलो में से मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी, राजस्थान का डीडवाना, महाराष्ट्र का नेवासा, उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर और पश्चिम बंगाल का बाकुण्डा एवं पुरलिया है।
  • इस काल में शिकार के दौरान उपयोग किये जाने वाले हथियारों में से प्रमुख रूप पत्थर की पपड़ियों के बने फलक, छेदनी और खुरचनी आदि इस काल के प्रमुख हथियार थे।हथियारों में क्वार्ट्जाइट के आलावा जैस्पर एवं चर्ट आदि पत्थरों का प्रयोग होने लगा था।

C. उच्च पुरापाषाण काल -

  • इस काल का कालखंड 40,000 ई.पू. से 10,000 ई.पू. तक माना जाता है।
  • इसी काल में होमो सेपियन्स (Homo Sapiens) अर्थात आधुनिक मानव का उदय हुआ था।
  • इस काल का मानव शैलाश्रयों (Rock shelter) में रहने लगा था।
  • इस काल में मानव चित्रकारी और नक्काशी करना जान चूका था।
  • इस काल के चित्रकारी के साक्ष्य मध्य प्रदेश में स्थित ‘भीमबेटका की गुफाओं’ से प्राप्त हुये हैं।
  • यहाँ प्रमुख स्थलो में से उत्तर प्रदेश स्थित बेलन घाटी, महाराष्ट्र स्थित बीजापुर एवं इनामगांव, केरल स्थित चित्तूर, झारखण्ड स्थिर छोटानागपुर का पठार आदि।
  • इस काल में शिकार के दौरान उपयोग किये जाने वाले हथियारों में से प्रमुख रूप हड्डियों से बने औजार, फलक, तक्षणी एवं शल्क आदि है।

2. मध्य पाषाण काल -

  • इस काल का कालखंड 10,000 ई.पू. से 7000 ई.पू. तक माना जाता है।
  • इस काल के मानव मछली पकड़कर, शिकार करके और खाद्य सामग्री एकत्रित कर जीवन यापन करते थे।
  • मानव द्वारा पशुपालन करने का प्रारम्भिक साक्ष्य इसी काल के मानवों का प्राप्त हुआ है।
  • मानव द्वारा पशुपालन के साक्ष्य राजस्थान के बागोर और मध्य प्रदेश के आदमगढ़ से प्राप्त हुए हैं।
  • इस काल के मानव एक ही स्थान पर काबिले के रूप में स्थायी निवास करते थे इसका प्रारंभिक साक्ष्य सराय नाहर राय (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) एवं महदहा से स्तम्भगर्त के रूप में मिलता है।
  • इस काल के मानवों द्वारा एक दूसरे पर आक्रमण और युद्ध करने के प्रारंभिक साक्ष्य भी सराय नाहर राय से प्राप्त हुए हैं।
  • इतिहासकारों का मत है कि ‘मातृदेवी की उपासना’ और ‘शवाधान की पद्धति’ संभवतः इसी काल में प्रारम्भ हुई होगी।
  • यहाँ प्रमुख स्थलो में से बिहार का ‘पायसरा – मुंगेर’, राजस्थान का बागोर, गुजरात का लंघनाज, उत्तर प्रदेश स्थित सराय नाहर राय (प्रतापगढ़) और महागढ, मध्य प्रदेश स्थित आदमगढ़ (होशंगाबाद), भीमबेटका (भोपाल) और बोधोर आदि है।

इस काल में शिकार के दौरान उपयोग किये जाने वाले हथियारों में से प्रमुख रूप से -

  • तीर कमान (सर्वप्रथम का अविष्कार इसी काल में हुआ था।)
  • पत्थर और हड्डियों के बने हथियार ( लेकिन ये पुरापाषाणकाल की तुलना में बहुत छोटे होते थे, इसलिए इन्हें माइक्रोलिथ अर्थात लघुपाषण भी कहा जाता है।)
  • हथियारों में लकड़ियों और हड्डियों के हत्थे लगे हंसिए एवं आरी आदि हथियार मिलते हैं।
  • नुकीले क्रोड, त्रिकोण, ब्लेड और नवचन्द्राकर आदि आकार के प्रमुख हथियार थे।

3. नवपाषाण काल -

  • नवपाषाण काल विश्व के लिए 9,000 ई.पू. से और भारत के लिए 7,000 ई.पू. से 2,500 ई.पू. तक माना जाता है।
  • कृषि कार्य का प्रारम्भ, पशु पालन, पत्थरों को घिसकर औजार और हथियार बनाना आदि इस काल की प्रमुख विशेषता थी।
  • इसी काल में पत्थर की कुल्हाड़ियों का प्रयोग किया जाता था।
  • इस काल में मिट्टी के बने बर्तनों (मृदभांडों) का प्रयोग और उनमे विविधता मिलती है।
  • ग्राम समुदाय का प्रारम्भ और स्थिर ग्राम्य जीवन का विकास भी संभवतः इसी काल में हुआ था, अर्थात मानव घर बना कर एक ही स्थान पर रहता था।
  • इस काल के मानव गोलाकार और आयतकार घरों में रहा करते थे जिसे मिट्टी और सरकंडों से बनाया जाता था।
  • बलूचिस्तान के मेहरगढ़ से इस काल की कृषि का प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुआ है। मेहरगढ़ से जौ, गेहूँ, खजूर और कपास की फसलों के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यहाँ के लोग मिट्टी के कच्ची ईटों से बने आयताकार घरों में रहा करते थे।
  • मानव द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त की जाने वाला अनाज जौ था।
  • उत्तर प्रदेश के कोलडिहवा (इलाहबाद) से 6,000 ई.पू. के चावल उत्पादन के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  • कश्मीर के बुर्जहोम से गर्तावास (गड्ढा रूपी घर), हड्डी के औजार आदि मिले हैं। साथ ही कब्रों में मालिक के शवों के साथ उनके पालतू कुत्तों को भी दफनाया गया है।
  • सर्वप्रथम इसी काल में कुत्तों को पालतू बनाया गया था।
  • बिहार के चिरांद (सारण) से हड्डी के बने औजार और मुख्य रूप से हिरन के सींगों से बने उपकरण मिले हैं।
  • कुंभकारी सर्वप्रथम इसी काल में मिलती है, बर्तनों में पॉलिशदार काला मृदभांड, धूसर मृदभांड और चटाई की छाप वाले मृदभांड प्रमुख हैं।
  • कर्णाटक के पिक्लीहल से राख के ढेर तथा निवास स्थान मिले हैं। यहाँ के निवासी पशु पाला करते थे।
  • यहाँ प्रमुख स्थलो में से सरुतरु और मारकडोला (असम), उतनूर (आन्ध्र प्रदेश), चिरांद, सेनुआर (बिहार), बुर्जहोम, गुफ्कराल (कश्मीर), कोलडिहवा, महागढ (उत्तर  प्रदेश), पैयमपल्ली (तमिलनाडु), ब्रह्मगिरि, कोडक्कल, पिक्लीहल, हल्लुर, मस्की, संगेनकल्लु (कर्नाटक), मेहरगढ़ (पाकिस्तान) है |

आद्य ऐतिहासिक काल (Primeval Historical Period) -

जिस काल में लिखित साक्ष्य या लिपि होने के बाद भी इसे पढ़ा नहीं जा सकता उसे ,आद्य ऐतिहासिक काल कहते है। सिंधु एवं वैदिक सभ्यता इस काल से संबंधित है। इस काल केअध्ययन हेतु पुरातात्विक एवं साहित्यिक दोनों प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं, परंतु पुरातात्विक साक्ष्यों का ही उपयोग हो पाता है। वैदिक साहित्य इसका अपवाद है।

आद्य ऐतिहासिक काल को दो भागों में बांटा जाता है –

  1. ताम्रपाषण काल
  2. लौह काल

ताम्र-पाषाणिक काल -

  • जिस काल में मनुष्य ने पत्थर और तांबे के औज़ारों का साथ-साथ प्रयोग किया, उस काल को ‘ताम्र-पाषाणिक काल’ कहते हैं। सर्वप्रथम जिस धातु को औज़ारों में प्रयुक्त किया गया वह थी – ‘तांबा’। 
  • भारत में ताम्र पाषाण अवस्था के मुख्य क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में हैं। 
  • बनासघाटी’ में स्थित ‘अहाड़’ में सपाट कुल्हाड़ियां, चूड़ियां और कई तरह की चादरें प्राप्त हुई हैं। ये सब तांबे से निर्मित उपकरण थे। ‘गिलुन्डु’, जहां पर एक प्रस्तर फलक उद्योग के अवशेष मिले हैं, ‘अहाड़ संस्कृति’ का केन्द्र बिन्दु माना जाता है।
  • इस काल में लोग गेहूँ, धान और दाल की खेती करते थे। पशुओं में ये गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर और ऊँट पालते थे। ‘जोर्वे संस्कृति’ के अन्तर्गत एक पांच कमरों वाले मकान का अवशेष मिला है।
  • जीवन सामान्यतः ग्रामीण था। कुछ बर्तन, जैसे ‘साधारण तश्तरियां’ एवं ‘साधारण कटोरे’ महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में ‘सूत एवं रेशम के धागे’ तथा ‘कायथा’ में मिले ‘मनके के हार’ के आधार पर कहा जा एकता है कि ‘ताम्र-पाषाण काल’ में लोग कताई-बुनाई एवं सोनारी व्यवसाय से परिचित थे। 
  • इस काल के लोग लेखन कला से अनभिज्ञ थे।राजस्थान और मालवा में प्राप्त मिट्टी निर्मित वृषभ की मूर्ति एवं ‘इनाम गांव से प्राप्त ‘मातृदेवी की मूर्ति’ से लगता है कि लोग वृषभ एवं मातृदेवी की पूजा करते थे |

लौह काल -

उत्तर भारत में लौह काल के साथ-साथ चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति कायम हुई है। दक्षिण भारत में लौह काल महापाषाण संस्कृति के समकालीन था।

ऐतिहासिक काल -

मानव विकास के उस काल को ऐतिहासिक कहा जाता है, जिसके लिए लिखित विवरण उपलब्ध है। मनुष्य की कहानी आज से लगभग दस लाख वर्ष पूर्व प्रारम्भ होती है, पर ‘ज्ञानी मानव‘ होमो सैपियंस Homo sapiens का प्रवेश इस धरती पर आज से क़रीब तीस या चालीस हज़ार वर्ष पहले ही हुआ। इस काल के अध्ययन हेतु पुरातात्विक, साहित्यिक तथा विदेशियों के वर्णन, तीनों प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं।

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